Tuesday, April 1, 2014

Failure is a challenge....


Failure is a challenge, accept it as it comes... Focus what is lacking, analyze and reform. Unless you succeed, give up all your sleep, Do not run away, until you win the battle and succeed. One who keeps on trying, seldom are defeated, Applauded are those persons, who leave no stones unturned.

Friday, December 30, 2011

एक नव वर्ष की शुरुआत की और अपना पहला कदम अग्रसर करे!



आज हम फिर उस मोर पर है जहाँ हमारे पास फिर एक नई किताब है
इस किताब का हर पन्ना खली है, हमे ही इन पन्नो को अपने शब्दों से सजाना है,
इस किताब का नाम है सुअवसर, और इसका पहला अध्याय है नूतन वर्ष!

२०११ मे हमने कुछ  पन्नो का चयन किया तो पाया
कुछ पलो ने हमे रुलाया और कुछ पलो ने हसाया.

जहा एक और हमारा साथ महानयको (जगजीत जी, देव साहब आदि ) से छुटा,
वही दूसरी और टीम इंडिया ने वर्ल्ड कप का ख़िताब जीता !











कुछ खट्टी  कुछ मीठी, कुछ यादें निराली
अपनी हसी अपनी ख़ुशी अपनी परिश्रम और अपने आंसू सब को समेटे हुए
एक नव वर्ष की शुरुआत की और अपना पहला कदम अग्रसर करे!

इश्वर से ये कामना है की सभी को ख़ुशी और संतुष्टि दे,
और विश्व मे शांति, सद्भावना एवं प्यार बना रहे.

पर्ल, प्रोतिमा एवं सुभाष  

Thursday, December 31, 2009

!! जो बीत गई वो बात गई -- विगत वर्ष २००९ की अच्छी बातो को समेट कर आओ हम सब नूतन वर्ष २०१० का स्वागत करे !!



जीवन में एक सितारा  था, 
माना, वह बेहद प्यारा था, वह डब गया तो डब गया;
अंबर के आनन को देखो,कतने इसके तारे टूटे कितने इसके प्यारे छुटे, 
जो छट गए फिर कहाँ मिले;  
पर बोलो टूटे तारों पर कब अंबर शोक मनाता है ! 
जो बीत गई सो बात गई !गई


जीवन में वह था एक कुसुम,
थे उस पर नित्य निछावर तुम,

वह सूख गया तो सूख गया;
मधुवन की छाती को देखो,

सूखीं कितनी इसकी किलयाँ, मुरझाईं कितनी वल्लिरयाँ
जो मुरझाईं फिर कहाँ खिली ; 
पर बोलो सूखे फूलों पर कब मधुवन शोर मचाता है; 
जो बीत गई सो बात गई !


जीवन में मधु का प्याला था, 
तुमने तन-मन दे डाला था, वह टूट  गया तो टूट गया  ;
मिदरालय का आँगन देखो,
कितने प्याले हिल जाते हैं, गिर मिटटी मैं मिल जाते हैं, 
जो गिरते हैं कब उठते हैं; 
पर बोलो टूटे प्यालों पर कब मिदरालय पछताता है ! 
जो बीत गई सो बात गई !



विगत वर्ष २००९ की अच्छी  बातो को समेट कर आओ हम सब नूतन वर्ष २०१० का स्वागत श्री हिरवंशराय बच्चन जी की ईन शब्दों के साथ करे और आशा करे की यह वर्ष शांतिपूर्ण हो और सब के दुखो का निवारण करे और सब की अकंशाओ को पूर्ण करने में समर्थ हो! 
प्रोतिमा, पर्ल एवेम सुभाष



पक्षियों की तरह, चेह्चाते हुए, बदलो की तरह लहराते हुए.. आओ अनावश्यक स्मृतियों को पीछे छोड़ते हुए  ... शिकायत, दुख, दर्द, भय और अफसोस को भूलते हुए  इस सुन्दर जीवन  का आनंद ले!
प्रोतिमा, पर्ल एवेम सुभाष


Thursday, December 10, 2009

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती


कोशिश करने वालों की
हरिवंशराय बच्चन (Harivansh Rai Bachchan)
लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों परसौ बार फिसलती है।
मन
 का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरनागिरकर चढ़ना  अखरता है।
आख़िर
 उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते
 नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी
 उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
असफलता एक चुनौती हैइसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गईदेखो और सुधार करो।
जब
 तक  सफल होनींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ
 किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

Thursday, December 4, 2008

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है

हो जाए न पथ मे रात कही,
मंजिल भी तो है दूर नही,
ये सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी - जल्दी चलता है,
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !


बच्चे प्रत्याशा मई होंगे 
नीरो से झांक रहे होंगे 
ये सोच पारो मई चिरियो के भरता कितनी चंचलता है 
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !


Wednesday, December 3, 2008

सचमुच तेरी बरी निराशा


जल की धार पड़ी दिखलाई,
जिसने तेरी प्यास बढाई,
मरुथल मे मृगजल के पीछे दौड़ मिटी सब तेरी आशा !
सचमुच तेरी बरी निराशा !

तुने समझा देव मनुज है,
पाया तुने मनुज दनुज है,
बाध्य घृणा करने को यो है पूजा करने की अभिलाषा !
सचमुच तेरी बरी निराशा !

समझा तुने प्यार अमर है,
तुने पाया वह नश्वर है,
छोटे से जीवन से की तुने बड़ी-बड़ी प्रत्याशा !
सचमुच तेरी बरी निराशा !

Tuesday, December 2, 2008

जीवन की अभिलाषा

दुर्दिन की दुर्भाग्य - निशा मे,
लीन हुई अज्ञात दिशा मे,
साथी जो समझा करते थे मेरे पागल मन की भाषा !
फिर भी जीवन की अभिलाषा !

सुखी किरण दिन की जो खोई,
मिली न सपनो में भी कोई,
फिर प्रभात होगा, इसकी भी रही नही प्राची से आशा !
फिर भी जीवन की अभिलाषा !

शुन्य प्रतीक्षा मे है मेरी,
गिनती के क्षण की है देरी,
अंधकर मे समां जाएगा संसृति का सब खेल-तमाशा !
फिर भी जीवन की अभिलाषा !