दुर्दिन की दुर्भाग्य - निशा मे,
लीन हुई अज्ञात दिशा मे,
साथी जो समझा करते थे मेरे पागल मन की भाषा !
फिर भी जीवन की अभिलाषा !
सुखी किरण दिन की जो खोई,
मिली न सपनो में भी कोई,
फिर प्रभात होगा, इसकी भी रही नही प्राची से आशा !
फिर भी जीवन की अभिलाषा !
शुन्य प्रतीक्षा मे है मेरी,
गिनती के क्षण की है देरी,
अंधकर मे समां जाएगा संसृति का सब खेल-तमाशा !
फिर भी जीवन की अभिलाषा !
Tuesday, December 2, 2008
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