Sunday, November 30, 2008

हमारी मृदुल इच्छा!

हा, तुम्हारी मृदुल इच्छा!
हाय, मेरी कटु अनिच्छा!
था बहुत माँगा ना तुमने किन्तु वह भी दे ना पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

स्नेह का वह कण तरल था,
मधु न था, न सुधा-गरल था,
एक क्षण को भी, सरलते, क्यों समझ तुमको न पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!
बूँद कल की आज सागर,
सोचता हूँ बैठ तट पर -
क्यों अभी तक डूब इसमें कर न अपना अंत पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

हो जाए न पथ पर रात कही!
मंजिल भी तो है दूर नही।
ये सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी जल्दी चलता है
दिन जल्दी जल्दी ढलता है

2 comments:

Unknown said...

Are wao janu what a g8 blog u have made

Unknown said...

kavita ke itne shaukeen kam log hote hai, keep it going. Julie also keen about HR Bachchan's work?