Thursday, December 4, 2008

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है

हो जाए न पथ मे रात कही,
मंजिल भी तो है दूर नही,
ये सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी - जल्दी चलता है,
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !


बच्चे प्रत्याशा मई होंगे 
नीरो से झांक रहे होंगे 
ये सोच पारो मई चिरियो के भरता कितनी चंचलता है 
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !


Wednesday, December 3, 2008

सचमुच तेरी बरी निराशा


जल की धार पड़ी दिखलाई,
जिसने तेरी प्यास बढाई,
मरुथल मे मृगजल के पीछे दौड़ मिटी सब तेरी आशा !
सचमुच तेरी बरी निराशा !

तुने समझा देव मनुज है,
पाया तुने मनुज दनुज है,
बाध्य घृणा करने को यो है पूजा करने की अभिलाषा !
सचमुच तेरी बरी निराशा !

समझा तुने प्यार अमर है,
तुने पाया वह नश्वर है,
छोटे से जीवन से की तुने बड़ी-बड़ी प्रत्याशा !
सचमुच तेरी बरी निराशा !

Tuesday, December 2, 2008

जीवन की अभिलाषा

दुर्दिन की दुर्भाग्य - निशा मे,
लीन हुई अज्ञात दिशा मे,
साथी जो समझा करते थे मेरे पागल मन की भाषा !
फिर भी जीवन की अभिलाषा !

सुखी किरण दिन की जो खोई,
मिली न सपनो में भी कोई,
फिर प्रभात होगा, इसकी भी रही नही प्राची से आशा !
फिर भी जीवन की अभिलाषा !

शुन्य प्रतीक्षा मे है मेरी,
गिनती के क्षण की है देरी,
अंधकर मे समां जाएगा संसृति का सब खेल-तमाशा !
फिर भी जीवन की अभिलाषा !